दिल को छू लेगी पितृपक्ष में पिता को समर्पित इस शिक्षक की ये कविता!

पापा तुम होते तो शायद

मैं भी बचपन जी लेता,

मस्त पवन सा उड़ता मैं भी

कुछ तो जीवन जी लेता।

बचपन में पचपन का अनुभव

बहुत सताता था पापा,

मेरा चेहरा माँ को तुम्हारी

याद दिलाता था पापा।

मेले में जाकर भी खाली

हाथ लौटता था पापा,

और बचाए पैसे ला चुपचाप

जोड़ता था पापा।

बहुत सोचता माँ के हाथों

में चूड़ी पहना दूँ मैं

और उनके सूने माथे पर

बिंदिया लाल सजा दूँ मैं।

लेकिन माँ हट पगले! कहकर

झट से गले लगा लेती,

मुझको बहला फुसला कर

आँसू चुपचाप बहा लेती।

मैं चुप रहकर माँ को सुबकते

देखा करता था पापा,

कुछ ना कर पाने के दुख से

तिल तिल मरता था पापा।

यारों के घर जाने से इसलिए

भी शरमा जाता था

उनके पापा में तुम दिखते

मैं यूँ भरमा जाता था

याद नही आता तुमने कब

कांधे पर बैठाया था ,

या फिर रोता देख मुझे कब

मेरा सर सहलाया था।

मैंने तो माँ को ही पापा

बनते देखा है पापा,

काँधों पर परिवार का बोझ

उठाते देखा है पापा

उनका बोझ कभी तो मैं भी

कम कर पाऊंगा पापा

मगर तुम्हारी कमी कभी ना

मैं भर पाऊंगा पापा।

पापा तुम बरगद थे घर के,

छत भी तुम,आकाश भी तुम

बाकी अब एकाकीपन है

या फिर घर का सूनापन।

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डॉ० पूजा कौशिक

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