‘अज्ञात सोर्स’ ने किया राजनीतिक दलों को मालामाल…

'अज्ञात सोर्स' ने किया राजनीतिक दलों को मालामाल
'अज्ञात सोर्स' ने किया राजनीतिक दलों को मालामाल

‘अज्ञात सोर्स’ ने किया राजनीतिक दलों को मालामाल…

500, 700 और एक हजार करोड़ रुपए… इतने पैसे के बारे में सुनते ही आपको किसी कारपोरेट घराने की बैलेंसशीट का ख्याल आ रहा होगा… लेकिन आज हम कारपोरेट घराने की नहीं बल्कि आपकी सेवा में लगी राजनीतिक पार्टियों की बात कर रहे हैं जिन्हें चंदे से अरबों रुपए मिल जाते हैं वो भी ‘अज्ञात सोर्स’ से जी हां ‘अज्ञात सोर्स’ यानी किसने पैसा दिया उसका कोई अता पता ही नहीं…जी हां कोई पात नहीं किसने पैसा दिया यही है ‘अज्ञात सोर्स’… आज हम आपको उसी ‘अज्ञात सोर्स’ के पूरे गणित के समझाएंगे… कि आखिर ये ‘अज्ञात सोर्स’ क्या बला है… दरअसल राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR ने गुरुवार को एक रिपोर्ट जारी की… जिसमें 2019 और 2020 में क्षेत्रीय पार्टियों को जो चंदा मिला उसमें से 55 फीसदी जी हां 55 फीसदी से अधिक ‘अज्ञात सोर्स’ से मिला… वहीं जो हमारी राष्ट्रीय पार्टियां हैं उन्हें तो 70.98 फीसदी चंदा ‘अज्ञात सोर्स’ से ही आया है…ADR की रिपोर्ट की माने तो वित्त वर्ष 2019-20 में 25 क्षेत्रीय दलों को 803 करोड़ रुपये से भी ज्यादा चंदा मिला… और मजे की बात तो यह कि इसमें 445.7 करोड़ रुपये के सोर्स की कोई जानकारी ही नहीं है… यानी 803 करोड़ में से 445 करोड़ रुपए अज्ञात स्रोतों से मिले हैं… एडीआर ने इसी साल अगस्त के महीने में राष्ट्रीय पार्टियों को मिलने वाले चंदे को लेकर भी ऐसी ही एक रिपोर्ट जारी की थी… रिपोर्ट की माने तो 6 राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों को वित्त वर्ष 2019-20 में अज्ञात सोर्स से 3 हजार 371.41 करोड़ रुपये मिले थे… ये राशि इन पार्टियों को उसी वित्त वर्ष में मिले कुल चंदे का 70.98 फीसदी है…

 

आपको बताते हैं चंदा देने वाले अज्ञात सोर्स आखिर है क्या…

दरअसल देश के राजनीतिक दलों को तीन स्रोत से चंदा मिलता है, एक चेक के द्वारा, दूसरा कैश और तीसरा इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिए… लेकिन 20 हजार से कम जो लोग कैश में, ध्यान दिजिएगा जी हां, कैश में चंदा देते हैं उनका कोई हिसाब-किताब ही नहीं देना होता और ना ही उनके नाम को सार्वजनिक किया जाता है…साथ ही इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिए जो सियासी दलों को चंदा मिलता है उस शख्स की पहचान भी जाहिर नहीं की जाती है…लेकिन चेक द्वारा जो चंदा मिलता है उस शख्स का नाम जाहिर करना होता है… और बस पूरा झोल यहीं पर होता है… क्योंकि राजनीतिक पार्टियों को 20 हजार से कम कैश और इलेक्टोरल बॉण्ड के जरिए मिलने वाले चंदे को अज्ञात सोर्स में रखा जाता है… एडीआर की माने तो अज्ञात सोर्स का करीब 95 फीसदी चंदा इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए मिलता है, क्योंकि अधिकतर इलेक्टोरल बॉण्ड में लोग अपनी पहचान नहीं बताते… एडीआर की मानें तो राजनीतिक ऐसे लोगों ट्रैक नहीं किया जा सकता…

 

अगर बात क्षेत्रीय दलों के अज्ञात सोर्स की करें तो …. एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार अज्ञात सोर्स से सबसे अधिक आय वाले क्षेत्रीय दलों की सूची में दक्षिण भारत की पार्टियां TRS, TDP, YSR कांग्रेस, DMK, जद (एस) और ओडिशा की सत्तारूढ़ बीजेडी शामिल है… तेलंगाना की TSR को 89.158 करोड़ रुपये अज्ञात सोर्स से मिला है… जबकि आंध्र प्रदेश की TDP को 81.694 करोड़ रुपये मिले… आंध्र प्रदेश की YSR कांग्रेस को 74.75 करोड़ रुपये, बीजेडी को 50.586 करोड़ रुपये और तमिलनाडु की डीएमके को 45.50 करोड़ रुपये अज्ञात सोर्स से मिले हैं…

 

राष्ट्रीय पार्टियों को अज्ञात स्रोत से मिला चंदा

अगस्त महीने में जारी हुई ADR की रिपोर्ट के अनुसार अज्ञात सोर्स से सबसे ज्यादा चंदा बीजेपी को मिला है…. 2019-20 में बीजेपी को अज्ञात सोर्स से हुई आय 2 हजार 642.63 करोड़ रुपये थी… ये उसकी कुल आय का 78.24 फीसदी था… जो कि सभी राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में सबसे ज्यादा है… इसके अलावा कांग्रेस को अज्ञात सोर्स से हुई आय 526 करोड़ रुपए थी जो कि उसके कुल चंदे का 15.57 फीसदी था…

 

वहीं बात अगर चुनावी खर्चों की करें तो बीजेपी द्वारा चुनाव आयोग को दिए गए विवरण के मुताबिक, BJP ने असम, पुडुचेरी, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और केरल में हुए चुनावों में 252 करोड़ रुपये खर्च किए… जिसमें से 151.18 करोड़ रुपए पश्चिम बंगाल चुनाव प्रचार के लिए खर्च किए गए… वहीं टीएमसी की तरफ से कहा गया कि उसकी तरफ से पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनावों में 154.28 करोड़ रुपये खर्च किए गए…

 

आपको यहां ये भी बता दें कि राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे में अधिक पारदर्शिता रखने के लिए केंद्र सरकार ने 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड की योजना शुरू की थी… इसमें हजार, दस हजार, एक लाख, दस लाख और एक करोड़ रुपये के बॉन्ड की श्रेणी तय की गई… लेकिन इसको लेकर जानकारी सामने आई है कि चंदा देने वाले लोग इसमें भी अपनी पहचान नहीं बताते…

 

जाहिर है आज के वक्त में राजनीतिक पार्टियों को पार्टी चलाने के लिए काफी धन की आवश्यकता होती है… इसकी व्यवस्था के लिए वे अन्य तरीकों के अलावा चंदे जैसे मुख्य स्रोत का सहारा लेते हैं… दरअसल मौजूदा जनप्रतिनिधित्व कानून के आसान प्रावधानों का पार्टी फायदा उठाती है… इस स्थिति में इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि अज्ञात सोर्स से इस मद में मिलने वाली भारी-भरकम राशि में कहीं काले धन की हिस्सेदारी न हो…

 

बता दें कि जनवरी, 1990 में औपचारिक तौर से राजनीतिक दलों के वित्तीय विवरण का मुद्दा तब उठा था जब दिनेश गोस्वामी के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन हुआ था… इस रिपोर्ट में कहा गया था कि ‘चुनावी सुधारों की मांग विशेष रूप से 1967 के बाद से जोर पकड़ती जा रही है’ इस तरह चुनावी प्रक्रिया का अहम हिस्सा यानी दलों के वित्तीय विवरण का मुद्दा पिछले 45 साल से उठ रहा है… इतना पुराना मुद्दा होने के बावजूद भी राजनीतिक दलों के वित्तीय विवरण आज भी देश के प्रमुख रहस्यों में से एक बना हुआ है…

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