मिशन-2022- यूपी में अमित शाह की हुंकार, 2017 के मुकाबले कितने बदले यूपी के हालात

मिशन-2022- यूपी में अमित शाह की हुंकार
मिशन-2022- यूपी में अमित शाह की हुंकार

मिशन-2022- यूपी में अमित शाह की हुंकार, 2017 के मुकाबले कितने बदले यूपी के हालात

UP Election 2022: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह शुक्रवार दो दिन के प्रवास पर लखनऊ पहुंचे, जहां वो सूबे की चुनावी नब्ज टटोल रहे हैं…. इतना ही नहीं अमित शाह बीजेपी के चुनावी रणनीति को भी धार देने में जुटे हैं…लेकिन सवाल ये है कि आखिर 2017 के मुकाबले इस बार यूपी के राजनीतिक हालात कितने अलग हैं… यानी यूपी के राजनीतिक हालात में कितना बदलाव आया है…

 

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो गई हैं… जहां सपा सत्ता में वापसी के लिए जद्दोजहद कर रही है तो वहीं बीजेपी अपने सियासी किले को बचाने में जुटी है… यूपी चुनाव से ठीक पहले अमित शाह का लखनऊ दौरा राजनीतिक लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है…हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री बनने के बाद अमित शाह वैसे तो कई बार लखनऊ आ चुके हैं, लेकिन पार्टी मुख्यालय में संगठन की बैठक लेने वो पहली बार पहुंचे…दरअसल अमित शाह मिशन-2022 की रणनीति को धार देने के लिए जुटे हैं… आपको याद होगा कि अमित शाह ने 2013 में यूपी प्रभारी के रूप में 2014 लोकसभा चुनाव की जिम्मेदारी संभाली थी…उस वक्त शाह ने एक ऐसा दांव खेला था कि पूरा विपक्ष चारों खाने चित हो गया था…हालांकि शाह का फोकस इस बार सामाजिक समरसता पर है, जिसके तहत पिछड़ों और दलितों को पार्टी से जोड़ने की रणनीति है… बता दें कि अमित शाह की अगुवाई में ही बीजेपी ने यूपी में वापसी की… जाहां साल 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रभारी रहते बीजेपी को जीत दिलाई तो वहीं 2017 के विधानसभा चुनाव में बतौर पार्टी अध्यक्ष सत्ता से 15 साल का वनवास खत्म कराने में भी वो कामयाब रहे…साथ ही शाह बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष 2019 में सपा-बसपा गठबंधन वाले चुनौतीपूर्ण चुनाव में विरोधी खेमे को चारों खाने चित कर चुके हैं… लेकिन अब साल बदल चुका है हाल बदल चुका है, जिसके चलते 2022 का चुनाव पिछले तीन चुनाव से काफी अलग रहने वाला है…

 

दरअसल 2017 में बीजेपी ने जब यूपी में जीत का परचम फहराया था तो समाजवादी पार्टी सत्ता में थी और अखिलेश भैया मुख्यमंत्री, लेकिन अब बीजेपी सत्ता में है और सपा विपक्ष में, ऐसे में बीजेपी के सामने अपने पांच साल के कामकाज लेकर जनता के बीच जाना है, जबकि 2017 में अखिलेश सरकार की खामियों लेकर BJP जनता के बीच गई थी… अगर यूपी के समीकरण की बात करें तो पिछले तीन दशक से हर पांच साल पर सत्ता परिवर्तन हो रहा है… और सत्ता में रहने वाली पार्टी सरकार में वापसी नहीं कर सकी है… ऐसे में शाह के सामने बीजेपी को सत्ता में वापसी कराने से लेकर 2017 जैसे नतीजे दोहराने की बड़ी चुनौती है…

2022 में आसान नहीं है BJP की राह

2022 के विधानसभा चुनावों की राह बीजेपी के लिए के इस बार इतनी आसान नहीं है…क्योंकि उसके सामने कई चुनौती हैं, जैसे कोरोना महामारी में विपक्ष ने सूबे की बिगड़ी स्वास्थ्य सेवा को बड़ा मुद्दा बनाया है, तो वहीं बेरोजगारी को लेकर लोगों की नाराजगी दूर करना भी BJP के आसान नहीं होगा… हालांकि, योगी सरकार चार साल में चार लाख लोगों को रोजगार देने का दावा कर रही है, लेकिन विपक्ष जिस तरह से रोजगार को चुनावी मुद्दा बनाने में जुटा है… इसके अलावा कृषि कानून को लेकर किसान आंदोलन ने भी यूपी में बीजेपी के माथे पर चुनावी चिंता की लकीरें खींच दी है…

यूपी में गड़बड़या बीजेपी का समीकरण!

दरअसल अमित शाह ने 2017 में ओम प्रकाश राजभर को साथ मिलाकर पूर्वांचल में पूरा सफाया कर दिया था तो पश्चिम में जाट और मुस्लिम की दूरी बीजेपी के लिए संजीवनी साबित हुई थी… हालांकि, इस बार ओमप्रकाश राजभर बीजेपी के खिलाफ सपा के साथ गठबंधन कर चुके हैं… इसके अलावा कई और भी कई छोटे दल सपा के साथ हैं… सपा लगातार गैर-यादव ओबीसी नेताओं और राजनीतिक दलों के साथ हाथ मिलाकर अपना सियासी समीकरण दुरुस्त करने में जुटे हैं… ऐसे में बीजेपी ने 2017 में जिस जातीय समीकरण के आधार पर सियासी जंग फतह की थी, उसी तर्ज पर इस बार सपा अपनी राजनीतिक बिसात बिछाने में जुटी है… जाट समाज से लेकर निषाद और राजभर जैसी जातियां पिछले चुनाव की तरह बीजेपी के साथ खड़ी नजर नहीं आ रही हैं और ब्राह्मण समाज को भी विपक्षी दल साधने में जुटे हैं…और तो और इस बार सपा खुलकर मुस्लिम कार्ड नहीं खेल रही… जिससे बीजेपी को तुष्टीकरण का मुद्दा भी नहीं मिल पा रहा…

यूपी में BJP के लिए बड़ी चुनौती कौन?

पूर्वांचल में भी बीजेपी के लिए राजभर और अखिलेश का गठबंधन बड़ी चुनौती बन सकता है… पूर्वांचल की कई सीटों पर राजभर समुदाय का प्रभाव हैं, जिसके चलते बीजेपी के लिए पूर्वांचल के किले को बचाना आसान नहीं होगा… इसके अलावा लखीमपुर खीरी की घटना से तराई बेल्ट के किसान भी नाराज हैं, जो बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं… ऐसे में देखना ये होगा कि अमित शाह इन सभी चुनौतियों से निपटने का क्या प्लान बनाते हैं…

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