आज विजय दिवस क्यों मनाया जाता है?

विजय दिवस

आज विजय दिवस क्यों मनाया जाता है?


रिपोर्ट: अमित सोनी


नई दिल्ली: इस ऐतिहासिक युद्ध युद्द के इतने वर्षों बाद भी छावनी स्थित मार्टियर्स होम में रहने वाले जांबाजों के परिवारीजन उस मंजर को याद कर जब दास्तां सुनाते हैं तो सुनने वालों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा की पाकिस्तानी जनरल एएके नियाजी को आत्मसमर्पण के दस्तावेजों पर हस्तक्षर करते हुए देखने की तस्वीर भी उन्हीं में से एक है। 50 साल पहले आज ही के दिन जो कुछ हुआ वो किसी देश की सेना के शर्मनाक सरेंडर, 93000 से ज्यादा सैनिकों के साथ किसी जनरल के आत्मसमर्पण से भी बहुत ज्यादा था यह मजहब के नाम पर बने दुनिया के इकलौते देश पाकिस्तान का दो हिस्सों में बंटना था। 68 वर्षीय गोविंद भंडारी ने बताया कि शादी का एक साल भी नहीं बीता था कि बांग्लादेश में युद्ध छिड़ गया। पति कुंडल सिंह भंडारी युद्ध पर चले गए। एक दिन फोन आया और बताया गया कि जंग में जख्मी होने के कारण उनके हाथ काट दिए गए। पैर भी गंभीर रूप से चोटिल थे। इसके बाद जिंदगी एक संघर्ष बन गई। और उन्होंने बताया मोहम्मद अली जिन्ना के टू-नेशन थिअरी या द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की भी शिकस्त थी। मजहब एक होने से मुल्क भी एक होगा, जिन्ना के उस सपने की हार थी। 1971 में पाकिस्तान ने बंगालियों पर भीषण जुल्मो-सितम का दौर शुरू किया तो महज 7 महीने बाद उसे शर्मनाक सरेंडर करना पड़ा। इतिहास तो बदला ही, भूगोल भी बदल गया। बांग्लादेश के रूप में एक नए देश का उदय हुआ। 1971 के युद्ध में 50 स्वतंत्र पैरा ब्रिगेड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए ढाका में प्रवेश करने वाली पहली भारतीय सैन्य यूनिट बनीं। इसका नेतृत्व तत्कालीन लेफ्टिनेंट कर्नल केएस पन्नु ने किया। पूर्वी पाकिस्तान के तंगेल में पैराड्रॉपिंग कर इतिहास बनाया और ढाका में घुसने वाली पहली यूनिट बनी। 11 दिसंबर को यह यूनिट 50 एयरक्राफ्ट के साथ कलाकुन्डा वायु सेना बेस व दमदम हवाई अड्डे से रवाना हुई थी। और पाकिस्तानी 93 इंफैन्ट्री ब्रिगेड की ओर से जवाबी कार्रवाई की जा रही थी। लेकिन भारतीय सेना ने उसे पीछे हटने पर मजबूर कर दिया। सेना ने 182 दुश्मनों को मार गिराया। इसी क्रम में 16 दिसंबर को सुबह पौने 11 बजे बटालियन ने ढाका में प्रवेश किया। साहसिक एवं वीरतापूर्ण कारनामों के कारण बटालियन को एक महावीर चक्र, पांच वीर चक्र, चार सेना मेडल व चार मेंशन-इन-डिस्पैचेज से नवाजा गया। इसके साथ थिएटर सम्मान-पूर्वी पाकिस्तान 1971 और बैटल सम्मान पूंगली ब्रिज से भी अलंकृत किया जा चुका है।

 

पाकिस्तान में अब भी यह थिअरी चलती है कि बांग्लादेश का उदय तो भारत की गहरी साजिशों का नतीजा था लेकिन शेख मुजीब उर रहमान की अगुआई में इस्लामाबाद के खिलाफ पनपे असंतोष, विद्रोह की हकीकत से इनकार नहीं किया जा सकता।’ असंतोष और अलगाव की भावना को दबाने के लिए पाकिस्तानी सेना ने अपने ही नागरिकों पर जो बर्बरता की, उसी ने यह सुनिश्चित कर दिया था कि उसका बस एक ही इलाज होगा- पूर्ण स्वतंत्रता, उससे कम कुछ नहीं। वही 1972-73 में राज्य सरकार और सेना के संयुक्त प्रयास से मार्टियर्स होम बसाया गया, जिसमें बांग्लादेश युद्ध में शामिल होने वाले वीरों के 16 परिवारों को बसाया गया है। तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने सैनिकों के लिए हजार से 1500 वर्ग फीट के मकान बनवाए। दावा किया गया था कि पांच वर्ष तक एक रुपये प्रतिवर्ष की दर से किराया होगा। इसके बाद मकान उपहार स्वरूप दे दिए जाएंगे। युद्ध में शामिल हुए वीर चक्र विजेता हवलदार कुंवर सिंह चौधरी की पत्नी लक्ष्मी देवी (80 वर्ष) ने बताया कि यहां बुनियादी सुविधाओं का अकाल है। चंपा देवी बिष्ट ने बताया कि पति की शहादत के बाद 134 रुपये की मासिक पेंशन में परिवार चलाना मुश्किल था। कुछ दिन तक सब ठीक चला लेकिन बाद में नोटिस आने लगे। एक बार एक अफसर ने हमें अवैध रिहायशी तक कह दिया था। युद्ध में एक हाथ गंवाने वाले सिपाही कुंडल सिंह भंडारी की पत्नी गोंविद देवी ने बताया कि कागजों की छानबीन सहित आए दिन जांच-पड़ताल होती है। वहीं मार्टियर्स होम में बिजली, सड़क, पानी, नाली, सुरक्षा आदि समस्याएं हैं। यही दर्द हवलदार गोपाल दास जोशी, सिपाही अजयवीर सिंह यादव, सिपाही अजयपाल शर्मा, नायक मदन सिंह रावत, सिपाही चंदर सिंह पांग्ती, सिपाही आन सिंह, सिपाही मंजुल मिश्र, अमृतलाल, राजा सिंह, पान सिंह तोमर, सिपाही मोहम्मदी, मोहन सिंह के परिजनों ने भी बयां किया। कैंट बोर्ड के सीईओ विलास पंवार ने बताया कि अभी मुझे इस प्रकरण की जानकारी नहीं है। समस्याओं का निस्तारण सक्षम स्तर से करवाया जाएगा।

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